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दिल्ली से बड़ा था यूपी का खेल, आबकारी नीति से लगा था 24 हज़ार करोड़ का चूना

आकाश शुक्ला, ब्यूरो

दिल्ली में नई आबकारी नीति में भ्रष्टाचार के आरोप में सीबीआई ने डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया समेत 15 लोगों को आरोपी बनाया है. दिल्ली का शराब घोटाला करीब 144 करोड़ के आसपास का है. इससे कहीं बड़ा घोटाला यूपी में काफी पहले हो चुका है. कैग ने अपनी रिपोर्ट में इसका खुलासा भी कर दिया था लेकिन अभी तक यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है. चलिए जानते हैं इसके बारे में.

लखनऊ: दिल्ली में हुए 144 करोड़ के शराब घोटाले को लेकर हंगामा बरपा हुआ है. सीबीआई ने तेजी दिखाते हुए इस मामले में डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया समेत 15 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है. इससे कहीं बड़ा घोटाला यूपी में काफी पहले हो चुका है. इससे यूपी सरकार को 24 हजार करोड़ का चूना लगा था. कैग ने अपनी रिपोर्ट में बकायदा इसका खुलासा भी किया था. कैग की रिपोर्ट 3 साल बाद भी ठंडे बस्ते में पड़ी है. रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि सरकार इस नुकसान की जांच करा कर उनकी जिम्मेदारी तय करें जिन्होंने शराब कारोबारियों को लाभ पहुंचाया था. 3 साल से रिपोर्ट के ठंडे बस्ते में पड़े होने पर विपक्ष सवाल उठा रहा है.

अप्रैल, 2019 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने एक रिपोर्ट तैयार की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2008-09 में आबकारी नीति लागू की गई थी, जो साल 2018 तक जारी रही. इस आबकारी नीति के चलते सरकार को 24,805.96 करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान था.

रिपोर्ट में कहा गया था कि साल 2009-10 की आबकारी नीति के अनुसार उत्तर प्रदेश में पड़ोसी राज्यों से शराब तस्करी को रोकने के लिए मेरठ जोन को स्पेशल जोन बनाया गया था. इस जोन में पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती सिर्फ 11 जिले रखे गए बल्कि अलीगढ़ व मेरठ दोनों जिलों को इस जोन में नहीं रखा गया था जबकि ये दोनों ही जिले राजस्थान व हरियाणा से जुड़े हुए थे, जहां से सबसे अधिक शराब तस्करी होती थी.रिपोर्ट में कहा गया था कि इसी नीति के तहत राज्य की कुल शराब की दुकानों की 22 प्रतिशत दुकानें सिर्फ स्पेशल जोन मेरठ में थी और उन्हें एक ही फर्म को आवंटित किया गया था. जबकि अन्य जोन वाराणसी, लखनऊ, गोरखपुर व आगरा में लॉटरी के माध्यम से दुकानें विभिन्न लोगों को आवंटित की गई थी.

रिपोर्ट में कहा गया था कि स्पेशल ज़ोन में देशी मदिरा की बिक्री अन्य जोन से बिल्कुल विपरीत नियमों के तहत हो रही थी जो नियमों के विरूद्ध था.कैग रिपोर्ट में साफ कहा गया कि साल 2009 में बनाई गई आबकारी नीति में खामियों की जानकारी होते हुए भी उस तत्कलीन प्रमुख सचिव आबकारी व कमिश्नर आबकारी ने जानबूझ कर अगले नौ साल यानी कि 2018 तक जारी रखा था. इससे कुछ खास अनुज्ञापियो (लाइसेंसी) की दुकानों का नवीनीकरण होता गया और उन्हें लाभ मिलता गया जबकि सरकार को 24,805.96 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था.राज्य सरकार ने भारत में बनी विदेशी शराब (IMFL) की बिक्री में गिरावट को रोकने और राज्य के राजस्व हितों की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार का कोई प्रयास नही किया. साथ ही बिक्री की गिरावट के मूल कारण की जांच तक नही करवाई. कैग ने रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि मामले की गहन जांच और डिस्टिलरी/ब्रेवरीज, थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं को अनुचित लाभ देने के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने की जरूरत है.

आबकारी नीति के चलते हुए सरकार के राजस्व को नुकसान पर आई कैग रिपोर्ट के अनुसार बसपा सरकार में बनी आबकारी नीति सपा व भाजपा सरकार में भी जारी रही थी. यानी कि अगर कार्रवाई होती है तो तत्कालीन प्रमुख सचिवों व आबकारी आयुक्तों के अलावा तत्कालीन आबकारी मंत्रियों का भी फंसना तय था. हालांकि ये रिपोर्ट पब्लिक एकाउंट कमेटी (PAC) के सामने पिछले 3 सालों से है, जो किसी भी कार्रवाई का इंतजार कर रही है. वहीं अब जब दिल्ली में मामले ने तूल पकड़ रखा है ऐसे में कोई भी अधिकारी इस पर बोलने को तैयार नही है.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने 3 साल पहले आई आबकारी नीति को लेकर कैग रिपोर्ट व दिल्ली में हो रही सीबीआई की कार्रवाई दोनों पर सवाल उठाए हैं. प्रवक्ता कृष्णकांत पांडेय ने कहा है कि तीन साल पहले एक रिपोर्ट कहती है कि यूपी में आबकारी नीति के चलते प्रदेश के राजस्व को 24 हजार करोड़ का नुकसान होता है और जांच होकर कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन अब तक जांच व कार्रवाई का कोई अता पता नहीं है. वहीं दिल्ली में क्योंकि विपक्ष की सरकार है तो वहां सीबीआई का इस्तेमाल कर कार्रवाई कराई जा रही है. उनका कहना है कि कैग की रिपोर्ट में अब तक कार्रवाई न होने का मतलब साफ है कि सरकार न ही अधिकारियों पर गाज गिराना चाहती है और न ही शराब कारोबारियों पर, क्योंकि भाजपा सरकार इन्ही कारोबारियों के बल पर चल रही है.

 

                        …..साभार:ईटीवी भारत

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